उत्तर प्रदेश के कानपुर और राजधानी लखनऊ के बीच की दूरी महज 80-90 किलोमीटर है, लेकिन इस दूरी के बीच जो काला साम्राज्य पनपा, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया। हालिया पुलिस जांच और खुलासे में यह बात सामने आई है कि कानपुर में सक्रिय किडनी के सौदागरों का असली ‘कंट्रोल रूम’ लखनऊ के एक पॉश इलाके में स्थित एक तथाकथित रीजनल ऑफिस से संचालित हो रहा था।
1. नेटवर्क का केंद्र: लखनऊ का वह ‘गुप्त’ ऑफिस
कानपुर पुलिस की एसआईटी (SIT) जांच में यह तथ्य उभरकर आया है कि किडनी तस्करी का यह कोई छोटा-मोटा गिरोह नहीं, बल्कि एक संगठित कॉरपोरेट की तरह चलने वाला नेटवर्क था। लखनऊ के गोमती नगर या विभूति खंड जैसे इलाकों में किराए पर ऑफिस लेकर इसे एक ‘मेडिकल कंसल्टेंसी’ या ‘ट्रैवल एजेंसी’ का नाम दिया जाता था।
- भर्ती प्रक्रिया: यहाँ एजेंटों को कमीशन पर रखा जाता था।
- डेटा माइनिंग: अस्पताल के रिकॉर्ड्स और सोशल मीडिया से उन लोगों की जानकारी निकाली जाती थी जिन्हें किडनी की सख्त जरूरत थी।
- टारगेट: गरीब तबके के लोग, जो कर्ज में डूबे हों या आर्थिक तंगी से गुजर रहे हों।
2. कैसे काम करता था यह सिंडिकेट?
इस गिरोह की कार्यप्रणाली (Modus Operandi) बेहद शातिर थी। इसे मुख्य रूप से चार चरणों में समझा जा सकता है:
- शिकार की तलाश: एजेंट गांवों और छोटे शहरों (जैसे उन्नाव, हरदोई, लखीमपुर) में जाकर ऐसे लोगों को ढूंढते थे जिन्हें पैसे की जरूरत हो।
- दस्तावेजों की जालसाजी: लखनऊ के ऑफिस में ही डोनर और रिसीवर के फर्जी रिश्ते के दस्तावेज तैयार किए जाते थे। आधार कार्ड, राशन कार्ड और निवास प्रमाण पत्रों में हेराफेरी की जाती थी ताकि वे कागजों पर सगे संबंधी दिख सकें।
- अस्पतालों से सांठगांठ: दिल्ली, नोएडा और यहां तक कि तुर्की या श्रीलंका जैसे देशों के बड़े अस्पतालों के कुछ भ्रष्ट कर्मचारियों के साथ इनका सीधा तालमेल होता था।
- ऑपरेशन और भुगतान: एक किडनी का सौदा ₹30 लाख से ₹50 लाख में होता था, जबकि डोनर को महज ₹2 लाख से ₹4 लाख देकर टरका दिया जाता था।
3. कानपुर कनेक्शन: जहाँ से बिछा जाल
कानपुर इस पूरे खेल का ‘सप्लाई हब’ था। बर्रा, किदवई नगर और कल्याणपुर जैसे इलाकों से कई ऐसे मामले सामने आए जहां लोगों को नौकरी का झांसा देकर लखनऊ ले जाया गया और वहां उनकी किडनी निकाल ली गई।
जब कानपुर पुलिस ने गौरव और विक्की जैसे छोटे एजेंटों को पकड़ा, तब जाकर कड़ियां जुड़ीं और बड़े सरगनाओं का चेहरा सामने आया। पुलिस के अनुसार, लखनऊ का यह नेटवर्क उत्तर प्रदेश के 10 से ज्यादा शहरों में फैला हुआ था।
4. सोशल मीडिया और व्हाट्सएप ग्रुप का इस्तेमाल
जांच में यह भी पता चला कि सौदागर अब तकनीक का सहारा ले रहे हैं। ‘Kidney Donor Required’ जैसे नाम से फेसबुक ग्रुप्स और व्हाट्सएप ब्रॉडकास्ट के जरिए डिमांड और सप्लाई का मिलान किया जाता था। लखनऊ स्थित ऑफिस से इन सभी ग्रुप्स की मॉनिटरिंग होती थी।
5. पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई
कानपुर पुलिस कमिश्नरेट ने इस मामले में कई गिरफ्तारियां की हैं। लखनऊ स्थित ठिकानों पर छापेमारी कर लैपटॉप, फर्जी मोहरें और सैकड़ों की संख्या में डोनर्स की फाइलें बरामद की गई हैं।
“यह नेटवर्क सिर्फ यूपी तक सीमित नहीं है, इसके तार अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार जा रहे हैं। लखनऊ का ऑफिस केवल एक प्रशासनिक केंद्र था, असली फंडिंग के स्रोत कहीं और हैं।” – एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का बयान
6. आम जनता के लिए चेतावनी
अंग प्रत्यारोपण (Organ Transplant) के लिए भारत में सख्त कानून हैं। ‘मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम 1994’ (THOA) के तहत अंगों की खरीद-फरोख्त एक गैर-जमानती अपराध है।
- कभी भी किसी एजेंट के झांसे में न आएं।
- अंग दान केवल पंजीकृत अस्पतालों और सरकारी प्रक्रिया के माध्यम से ही करें।
- यदि कोई आपको अंगों के बदले पैसे का लालच दे, तो तुरंत पुलिस को सूचना दें।
निष्कर्ष
कानपुर का किडनी कांड महज एक आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की आर्थिक असमानता और स्वास्थ्य प्रणाली की खामियों का आईना है। लखनऊ के रीजनल ऑफिस से चलने वाला यह नेटवर्क इस बात का सबूत है कि अपराधी अब तकनीक और कॉरपोरेट ढांचे का इस्तेमाल कर रहे हैं। पुलिस की सख्ती ही इस गिरोह की जड़ों को काट सकती है।
