सन्त कबीर नगर -उमाशंकर मिश्र

आज का समाज जिस पश्चिमी सभ्यता को अंगीकार किये हुआ है इसके अंजाम का जरा भी भान कही दिखायी नही दे रहा है । लोग इसकी तरफ आकर्षित होते चले जा रहे है । इससे बचना चाहिए भारत जैसी सभ्यता किसी देश मे नही है । जो जीवन मर्यादा मे नही होता है उसका सम्बन्ध भला मानवता से कैसे हो सकता है । उक्त बाते महंथ उमाशंकर दास एक विशेष मुलाकात के दौरान कही ।

समाज का चिंतन करते हुए श्री महंथ ने कहा समाज जा कहां रहा है इसे कोई देख क्यो नही रहा है । राह चलते अपनो को देखकर बेगाना बनने जैसी स्थिति हो गयी है क्या आधुनिक युग की विकास की यही परिभाषा है ? न मर्यादा का कही ख्याल नजर आ रहा है न संस्कृत का कोई ध्यान नजर है पश्चिमी सभ्यता के ऐसे दीवाने हो जा रहे है मानो संस्कृत और मर्यादा का कोई मतलब नही होता है । मानव जीवन दुनिया का सबसे श्रेष्ठ जिन्दगी है इसे मर्यादा मे रखकर जितना जीया जायेगा उतना ही ये खूबसूरत नजर आयेगा । जो रिश्ता जिस रूप मे है उसे उसी रूप मे रखना चाहिए आज तो पहचानना मुश्किल हो गया है कि कौन क्या है ? कुंठित जिन्दगियो के एक सवाल पर उन्होने कहा कि

” सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया : । सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद दुःखभाग भवेत ॥

हमारे देश की यह संस्कृति रही है ये यहां कि वह मूल सभ्यता है जो कभी हर किसी की जुबां पर होती थी इसे भूलना ही कुंठित जिन्दगी की पहचान बन गयी है । आज लोग अपने तक सीमित हो गये है किसी को अपने मां बाप का भी ख्याल नही रहा ।

जो लोग इस सभ्यता को अपनी नैतिकता समझ रहे है उन्हे यह नही भूलना चाहिए कि वे भी किसी के मां बाप होगे वो भी किसी दिन बुढ़ापे की जिन्दगी मे आयेगे ।

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