गोरखपुर : बी पी मिश्र 

ईद के बाद ईद _उल _अजहा(बड़ी ईद) बकरीद पर अभी कोरोना वैश्विक महामारी का साया नजर आने लगा है।अब तक कुर्बानी के सिलसिले में कोई पहल नहीं हो पाई है। कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों की वजह से कुर्बानी के जानवरों की मंडी पर संशय बरकरार है। यह बात राष्ट्रीय मानवाधिकार संघ _भारत के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष (अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ ) शमशाद आलम एडवोकेट ने कही। साथ ही साथ उन्होंने कहा कि मुस्लिम संगठन जल्द ही जिले के आला अफसरों से मुलाकात करके कुर्बानी के जानवरों की अस्थायी बाजार के लिए गाइडलाइन जारी करने की मांग करें। इसलिए की गोरखपुर शहर में हर साल करीब 50,000 बकरे अल्लाह की राह में कुर्बान किए जाते हैं।
वहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार संघ भारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता व समाजसेवी व शायर मिन्नत गोरखपुरी ने कहा कि ईद _उल फितर (ईद ) और ईद_ उल_ अजहा मुसलमानों के दो प्रमुख त्यौहार हैं। कोरोना वैश्विक महामारी के चलते इस बार ईद की खुशियां फीकी रही है। लोगों को घर में ही नमाज अदा करनी पड़ी, साथ ही साथ मुबारकबाद देने लोग किसी की घर भी नहीं जा सके। ईद _उल _अजहा यानी बकरीद पर भी वैश्विक महामारी कोरोना का असर दिखाई दे रहा है। आश लगाई जा रही है कि 31 जुलाई या 1 अगस्त (चांद के अनुसार) ईद _उल _अजहा का पर्व/त्योहार मनाया जाएगा । 3 दिनों तक चलने वाले इस त्योहार पर कुर्बानी की परंपरा है। इस त्यौहार में करीब 20 दिन पहले से ही शहर के घंटाघर ,शाहमारूफ, इलाहीबाग, रसूलपुर और जाहिदाबाद में बकरों की स्थायी बाजार सजने लगते हैं। इन बाजारों में ऊंचे कद काठी वाले बकरों की मांग सबसे ज्यादा रहती है। इस बार ना बाजार दिख रहे हैं और ना ही मोहल्ले में बकरे बेचने वाले नजर आ रहे हैं।
साथ ही साथ मिन्नत गोरखपुरी ने कहा कि मुस्लिम समुदाय के लोग अभी भी इस त्यौहार को लेकर बहुत असमंजस में है।
वही शमशाद आलम (एडवोकेट) ने कहा कि ना ही उत्तर प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन दोनों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है लोग अभी भी असमंजस में है विशेष रुप से मुस्लिम समुदाय के लोग।

भावदीय
शमशाद आलम (एडवोकेट)
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष (अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ)
राष्ट्रीय मानवाधिकार संघ _भारत

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