संतकबीर नगर : उमाशंकर मिश्र

संतकबीरनगर : किसी भी परिवार की गरीबी, बेबसी और लाचारी उसके दुखों का समंदर साबित होती है। इन्सान जब तक स्वयं स्वस्थ है या फिर जिन्दा है तो जी तोड़ मेहनत करके अपने परिवार और मासूम बच्चों के पेट की भूख मिटाने के लिए जी तोड़ मेहनत करता है। जब खुद ही प्रकृति की मार का शिकार होकर जिन्दगी और मौत से जूझते हुए अपनी गरीबी को कोसने लगे तो सवाल समाज मे इन्सानियत और अपनत्व का झण्डा बुलंद करने मे लगे जिम्मेदारों के सामने यक्ष प्रश्न बन कर खड़े हो जाते हैं। जी हां यह हकीकत एक ऐसे होनहार युवा के जिन्दगी से जुड़ी है जिसके अपने भी उसकी लाचारी के चलते बेगाने होने लगे। गंभीर बीमारी से जूझ रहे चन्द्रौटी गांव निवासी 35 बर्षीय दिनेश यादव के चार मासूम बच्चों के दर्द को महसूस करते हुए गांव के ही सामाजिक युवकों ने आपस मे चन्दा करके उसके भविष्य को स्वस्थ और सुन्दर बनाने का प्रयास किया लेकिन उनका प्रयास समय के बदलते चक्र के चलते नाकाफी होता गया। दिनेश यादव के जीवन को बचाने के लिए चिकित्सकों ने एक और प्रयास करने का वादा किया है। दिनेश यादव की जान बचाने के लिए एक बार फिर स्थानीय युवकों ने चन्दे के लिए समाज के जिम्मेदारों से विनती करना शुरू कर दिया है लेकिन रविवार को डाक्टरों से मिले समय के तहत जैसे जैसे समय बीत रहा है दिनेश के परिवार के साथ ही उसे बचाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ रहे युवाओं मे भी हताशा और निराशा बढने लगी है। सवाल यह है कि रिजर्व बैंक के हस्ताक्षर वाले कागजों के चन्द टुकड़ों के चलते यह परिवार क्या अपने खुशियों की रौनक को दुबारा वापस पा सकता है या फिर चार मासूम समाज की संवेदनहीनता के चलते बचपन मे ही खुद को अनाथ कहलाने को विवश हो जाएंगे?

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